शहरों का नवजीवन

27 Jun 2015 |  1978

-----शहरों का नवजीवन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को जो तीन योजनाएं एक साथ लॉन्च कीं, वे हमारे शहरों की सूरत बदल सकती हैं। चार लाख करोड़ रुपए की प्रस्तावित लागत वाली इन योजनाओं में एक है स्मार्ट सिटीज मिशन, जिसके तहत देश में 100 स्मार्ट शहर विकसित किए जाने हैं। दूसरी योजना शहरों के कायाकल्प की है, जिसे अमृत (अटल मिशन फॉर रिजूवनेशन ऐंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन) नाम दिया गया है। इसके तहत 500 शहरों में बुनियादी इन्फ्रास्ट्रक्चर और सफाई की व्यवस्था सुधारी जाएगी। तीसरी है प्रधानमंत्री आवास योजना, जिसके तहत शहरों की गरीब आबादी को सस्ता और अच्छा आवास मुहैया कराने की बात है। योजनाएं लॉन्च करते हुए प्रधानमंत्री ने ठीक ही कहा कि आज शहरी विकास के मामले में समग्र दृष्टिकोण का अभाव है, और शहरों का विकास नगर प्रशासन के बजाय प्रॉपर्टी डीलरों द्वारा निर्देशित हो रहा है। लेकिन सही होते हुए भी यह पूरी बात नहीं है। असल सवाल यह बनता है कि शहरों में नागरिक प्रशासन जैसी कोई चीज अब क्या बची भी है? मुंबई जैसे एकाध दुर्लभ अपवादों को छोड़ दें तो नगर निगमों और नगरपालिकाओं का जमीन पर कहीं कोई असर ही नहीं दिखता। कॉरपोरेटरों की तो बात ही छोड़िए, ज्यादातर शहरों में लोग महापौर तक का नाम नहीं जानते। वजह यह है कि जनजीवन में अब इन संस्थाओं की कोई सार्थक भूमिका नहीं रह गई है। मानना पड़ेगा कि देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं में अगर सबसे ज्यादा अवमूल्यन कहीं दिखता है तो वह नगर निकाय ही हैं। न तो ये राजस्व संग्रह के मामले में प्रफेशनल नजरिया विकसित कर पाए हैं, न ही खर्च के मामले में। दोनों स्तरों पर इनमें संकीर्ण स्वार्थ इस कदर हावी दिखते हैं कि आम तौर पर इनकी कोई सार्वजनिक छवि ही नहीं बचती। टैक्स वसूली के मामले में ये जरा भी कड़ाई नहीं बरतते। इस डर से कि कहीं वोट समीकरण न बिगड़ जाए। इसी तरह खर्च की मदें चुनते हुए यह ध्यान रखा जाता है कि पैसे उन्हीं कामों में खर्च हों जिनसे सीधे-सीधे वोट पक्के होते हों। आलम यह है कि दिल्ली में नगरपालिकाएं नालियां बनवाने और उनकी साफ-सफाई पर ध्यान देने के बदले अपना पैसा कुछ ऐसे तबकों को पेंशनें बांटने में खर्च करती हैं, जिन्हें राज्य सरकार पहले से ही पेंशन दे रही है। इसी तरह अपने खर्चे अपने बल पर पूरे करने और बहुत जरूरत पड़ने पर ही राज्य सरकार से कर्ज या सहायता मांगने के बजाय लगभग सभी नगर निकाय यह मानकर चलते हैं कि उनकी ज्यादातर जरूरतें राज्य सरकार की मदद से ही पूरी होंगी। अगर केंद्र सरकार अपनी तीनों योजनाओं के जरिए शहरों की सूरत बदलना चाहती है तो सबसे पहले उसे राज्य सरकारों के साथ मिलकर नगर निकायों का हाल सुधारने में जुटना चाहिए।