लखनऊ।साल 1991 के बाद आर्थिक नीति की रणनीति ने प्रदेश और बाजार के बीच रिश्ते को नया रूप देने की कोशिश की।केंद्रीय नियोजन,राज्य के नियंत्रण और अक्सर प्रदेश के स्वामित्व से हम उस दिशा में बढ़े हैं,जहां उत्पादन में निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी है और प्रदेश की नियामकीय भूमिका है। इस बदलाव से नए संस्थागत ढांचे का निर्माण जरूरी हो गया है,इसका नाम सांविधिक नियामकीय प्राधिकरण है।
सांविधिक नियामकीय प्राधिकरण(एसआरए)पूरे भारत में फैल गए हैं।केंद्रीय स्तर पर 20 एसआरए हैं और प्रदेश स्तर पर इससे भी ज्यादा।बिजली वितरण,अचल संपत्ति विकास और जल शुल्क जैसे मामले ये ही देखते हैं।अब देश की अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से में ये नजर आते हैं। दूरसंचार स्पेक्ट्रम की कीमत तय करने और बीमा कंपनियों की सॉल्वेंसी पर नजर रखने से लेकर खुदरा निवेशकों की संपत्ति की सुरक्षा और नवीकरणीय ऊर्जा के शुल्क तय करने तक इनकी गतिविधियां असंख्य आर्थिक कारकों के रोजमर्रा के कामकाज और व्यवहार्यता पर असर डालती हैं।अब प्रदेश की काफी शक्ति एसआरए के माध्यम से इस्तेमाल की जा रही है। इसलिए एसआरए के भीतर अच्छी आंतरिक शासन व्यवस्था भारत की आर्थिक सफलता की बुनियाद होगी।
पारंपरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रदेश की शक्तियां तीन शाखाओं (विधायी, न्यायिक और कार्यकारी) में विभाजित होती हैं ताकि किसी एक पर बहुत अधिक शक्ति न हो,लेकिन एसआरए के पास एक ही संस्थागत सीमा के भीतर असाधारण और केंद्रित शक्तियां हैं।बाजारों की निगरानी और पर्यवेक्षण के लिए उनके पास कार्यकारी शक्तियां होती हैं। आम तौर पर उनके पास कानून बनाने के व्यापक अधिकार भी होते हैं और कुछ मामलों में विवादों का निपटारा करने और दंड लगाने की अर्द्धन्यायिक शक्तियां भी उनके पास होती हैं। संविधान की मौलिक अवधारणाओं से ऐसा विचलन हो तो एसआरए के भीतर अच्छी आंतरिक शासन व्यवस्था भी होनी ही चाहिए।
अर्द्ध विधायी शक्ति का आशय आचरण के ऐसे बाध्यकारी नियम लिखने से है,जो आर्थिक एजेंटों की गतिविधियों को नियंत्रित और विनियमित करते हैं।जब कोई निर्वाचित विधायिका कानून बनाती है तो उस पर राजनीतिक बहस होती है,बहुदलीय समीक्षा होती है,स्थायी समिति उसकी पड़ताल करती है और सार्वजनिक जवाबदेही भी होती है,लेकिन जब कोई एसआरए नियम बनाता है तो वह विधायी शक्ति का प्रयोग करता है,लेकिन उसकी राजनीतिक जांच परख नहीं होती।जब अधिकारी इन प्रक्रियाओं के बिना कानून लिखते हैं तो लोकतांत्रिक घाटा होता है।लोकतांत्रिक वैधता बहाल करने के लिए विशेष प्रयास की आवश्यकता होती है ताकि जांच परख हो और जनता को निर्णय प्रक्रिया में फिर शामिल किया जा सके।
किसी एसआरए का बोर्ड महत्त्वपूर्ण निगरानी तंत्र बन सकता है,जो एसआरए के विधायी और कार्यकारी कार्यों में शक्ति के केंद्रीकरण पर नियंत्रण रखे।इसके लिए प्रत्येक क्षेत्र की तेजी से बदलती जटिलताओं से निपटने के लिए तकनीकी विशेषज्ञता चाहिए। साथ ही बेहतर लोकतांत्रिक वैधता हासिल करने के लिए समाज से व्यक्तियों को भी शामिल करना जरूरी है।सभी भारतीय एसआरए में आंतरिक सदस्य और बाहरी अंशकालिक सदस्य होते हैं।
इस मामले में आज हम कहां हैं।वित्तीय क्षेत्र के एसआरए पर विचार करें,सभी का नेतृत्व पूर्व अफसरशाह करते हैं।सभी के बोर्ड में पद खाली बने रहते हैं।भारतीय रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड में 11 सदस्य हैं,इनमें से दो शैक्षणिक शोधकर्ता हैं और एक बाहरी विशेषज्ञ है।बाकी आठ पूर्व या वर्तमान अफसरशाह,रिजर्व बैंक के अंदरूनी सदस्य या सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकर हैं।भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के नौ में से छह सदस्य पूर्व या वर्तमान अफसरशाह हैं,रिजर्व बैंक/सेबी के अंदरूनी सदस्य हैं और एक बाजार विशेषज्ञ हैं।
भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण कुछ बेहतर है।इसके पांच बोर्ड सदस्यों में दो पूर्व या वर्तमान अफसरशाह,एक पूर्व सरकारी बैंकर और दो निजी क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं।पेंशन फंड विनियामक और विकास प्राधिकरण के सात बोर्ड सदस्यों में छह वर्तमान या पूर्व अफसरशाह हैं और एक सदस्य पूर्व नियामक है।
भारतीय ऋणशोधन अक्षमता और दिवालियापन बोर्ड और राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण भी इस पैमाने पर अलग नहीं दिखते।इनमें सबसे नया नियामक इंटरनैशनल फाइनैंशियल सर्विसेज सेंटर्स अथॉरिटी है,जिसका उद्देश्य गिफ्ट सिटी के भीतर वित्तीय प्रणाली को विश्व से होड़ करने योग्य बनाना है।अगर भारतीय वित्त को एंबेसडर कार मानें तो गिफ्ट सिटी का वित्त फरारी जैसा होना चाहिए,लेकिन जब हम बोर्ड को देखते हैं तो इसके सातों सदस्य या तो वर्तमान अथवा पूर्व अफसरशाह हैं या दूसरे एसआरए से बुलाए गए हैं।
इस स्थिति के लिए विश्व में प्रशासनिक राज्य शब्द प्रयोग होता है यानी ऐसा वातावरण,जहां शक्ति कार्यपालिका में केंद्रित रहती है और न्यायपालिका और विधायिका हाशिये पर चली जाती हैं।हमारे पास एसआरए के भीतर जन सेवक हैं और बोर्डों पर भी उनका वर्चस्व है।वित्तीय क्षेत्र के एसआरए का पूरी तरह अंदरूनी कब्जा हो चुका है।इससे तीन समस्याएं हो जाती हैं।
ज्ञान समस्या:आर्थिक सुधार की मूल नजर यह थी कि राज्य केंद्रीय नियोजन छोड़ देगा,निजी क्षेत्र को गतिशील और प्रतिस्पर्द्धी बनाएगा और नियामक संस्थानों में नए आर्थिक विचार और क्षेत्रीय विशेषज्ञता लाएगा।बेशक अफसरशाह और शुरू से नियामकों में रहे अधिकारी अमूल्य अनुभव रखते हैं, लेकिन समकालीन क्षेत्रीय विशेषज्ञता के बगैर संकीर्ण बोर्ड ऐसा नियामकीय कुआं बना देता है,जो अपने बनाए नियमों के आर्थिक वृद्धि और नवाचार पर होने वाला व्यावहारिक प्रभावों से आंखें मूंद लेता है।भारत का प्राथमिक उद्देश्य उच्च आर्थिक बढ़ोतरी करना है। इसके लिए ऐसे नियामकीय बोर्ड चाहिए, जिनके पास भारत और उन उन्नत अर्थव्यवस्थाओं से क्षेत्रीय तथा नियामकीय ज्ञान हो, जिनके समान हम आने वाले दशकों में बनना चाहते हैं।
राजनीतिक समस्या:एसआरए का उद्देश्य निजी कंपनियों को नीतियों के बारे में अधिक निश्चिंत करना था।सियासी शक्ति तमाम दलों के बीच घूमती रह सकती है,लेकिन नियामकों के निर्णय सरकार के दखल से परे होने चाहिए। नियामकीय बोर्डों में पूर्व और वर्तमान सरकारी अधिकारी भरे रहेंगे तो निष्पक्ष निगरानी के लिए जरूरी संस्थागत दूरी समाप्त हो जाएगी और नियामक के सरकारी दबाव में आ जाने की आशंका हो जाएगी।
शासन समस्या:अगर कोई संगठन अपने शीर्ष प्रबंधन के इशारे पर चलता है तो जांच और निगरानी कमजोर हो जाती है। नेतृत्व के लिए जवाबदेही नहीं रह जाती,जिससे गलतियां अधिक होती हैं।बोर्ड का काम निगरानी करना है,उसे प्रबंधन की जवाबदेही तय करनी चाहिए।अगर बोर्ड ही प्रबंधन हो (या ऐसे व्यक्तियों से बना हो जो प्रबंधन से प्रदर्शन करने को नहीं कह सकते) तो जवाबदेही तय नहीं हो पाएगी।
निजी क्षेत्र में हमने सिद्धांत अपनाया है कि बोर्ड के अधिकतर सदस्य स्वतंत्र निदेशक होंगे।ये स्वतंत्र आवाजें सुनिश्चित करती हैं कि प्रबंधन जवाबदेह बना रहे और बाहरी विशेषज्ञता का लाभ मिले।अब हमारे एसआरए के लिए भी ऐसा ही सांविधिक प्रावधान सोचने का समय आ गया है। एसआरए को नियंत्रित करने वाले कानूनों में संशोधन कर तय करना चाहिए कि बोर्ड में स्वतंत्र,गैर कार्यकारी सदस्य हों, जिन्हें शिक्षा जगत,निजी क्षेत्र के उद्योग,विधि और उपभोक्ता अधिकार क्षेत्र से लिया जाए।