मां को पालकी में बैठाकर कांवड़ यात्रा पर निकला परिवार, बेटों के साथ बहुओं ने भी उठाया भार
हरिद्वार से चंडीगढ़ की ओर पैदल जा रहे इस परिवार ने अपनी कांवड़ का नाम रखा है श्रवण कांवड़
सहारनपुर। देवाधिदेव महादेव का प्रिय श्रावण महिना शुरू होते ही हरिद्वार से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में देवाधिदेव महादेव के भक्तों की आस्था सड़कों पर दिखाई दे रही है।एक ऐसी कांवड़ भी दिखाई दी,जिसने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।यह कांवड़ सिर्फ गंगाजल लेकर जाने की यात्रा नहीं,बल्कि इसमें एक परिवार का अपनी मां के प्रति प्रेम,सेवा,संस्कार और समर्पण भी शामिल था।हरिद्वार से चंडीगढ़ की ओर पैदल जा रहे इस परिवार ने अपनी कांवड़ का नाम श्रवण कांवड़ रखा है,इसमें बेटे और बहुओं ने अपनी बुजुर्ग मां को पालकी में बैठाकर यात्रा पूरी की और देवाधिदेव महादेव का दर्शन कराया।
बता दें कि चंडीगढ़ के राजकुमार की पत्नी पूजा,भाभी केतकी और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ अपनी मां जयदेई को लेकर हरिद्वार पहुंचे थे।एक अगस्त को हरकी पैड़ी पर परिवार ने सबसे पहले मां के पैर धोए,उसके बाद उन्हें गंगा स्नान कराया।परिवार ने मां जयदेई के आशीर्वाद के साथ गंगाजल भरा और फिर यात्रा का अगला पड़ाव शुरू हुआ,इसके बाद बेटा और दोनों बहुएं बारी-बारी से पालकी को अपने कंधों पर उठाकर चंडीगढ़ की ओर पैदल निकल पड़े।चार दिन की लगातार पैदल यात्रा के बाद मंगलवार शाम यह परिवार सहारनपुर पहुंचा।इस अनोखी कांवड़ को देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी।
राजकुमार का कहना है कि उनके परिवार में सभी लोग एक-दूसरे के साथ प्रेम और सम्मान से रहते हैं। राजकुमार ने बताया कि वह पिछले करीब पांच वर्षों से कांवड़ यात्रा कर रहे हैं,लेकिन इस तरह की श्रवण कांवड़ पहली बार लेकर निकले हैं।करीब पांच साल पहले ही उनके मन में यह विचार आया था कि अगली बार जब भी वह कांवड़ यात्रा करेंगे, तो अपनी मां को साथ लेकर जाएंगे।
राजकुमार का कहना है कि माता-पिता अपने बच्चों को पालने में पूरी जिंदगी लगा देते हैं,वे बच्चों को पढ़ाते हैं,उन्हें संस्कार देते हैं और अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए हर संभव त्याग करते हैं,ऐसे में जब माता-पिता बुजुर्ग हो जाते हैं तो उनकी सेवा करना बच्चों का सबसे बड़ा धर्म और दायित्व होना चाहिए।
जयदेई बड़ी बहू केतकी बताती हैं कि उनके माता-पिता ने उन्हें जो संस्कार दिए हैं,वह उन्हीं का पालन कर रही हैं।केतकी का कहना है कि जयदेई ने उन्हें कभी बहू होने का एहसास नहीं होने दिया,हमेशा बेटियों की तरह प्यार दिया और परिवार में सम्मान दिया,यही वजह है कि आज सास की पूरे मन से उनकी सेवा कर रही हैं।
जयदेई की छोटी बहू पूजा अपनी सास के प्रति भावुक नजर आईं। पूजा कहती हैं कि जयदेई ने कभी भी उनके साथ सास जैसा व्यवहार नहीं किया,हमेशा दोनों बहुओं को अपनी बेटियों की तरह माना।परिवार के सभी सदस्य एक साथ रहते हैं,घर में एक ही चूल्हे पर खाना बनता है और सभी लोग मिल-बांटकर खाते हैं।
जयदेई का कहना है कि भगवान उनके बच्चों को हमेशा खुश रखें,उन्हें सुख,समृद्धि और लंबी उम्र दें,वह चाहती हैं कि उनका परिवार हमेशा इसी तरह प्रेम से एकजुट रहे और सभी बच्चे जीवनभर एक-दूसरे का साथ निभाते रहें।
इस कांवड़ को देखकर किसी ने उन्हें कलियुग का श्रवण कुमार कहा तो किसी ने बहुओं के संस्कारों को सलाम किया, लेकिन इस परिवार के लिए यह कोई असाधारण काम नहीं है. राजकुमार ने वही किया है,जो हर संतान को अपने माता-पिता के लिए करना चाहिए।मां को पालकी में बैठाकर कांवड़ यात्रा पर निकला परिवार, बेटों के साथ बहुओं ने भी उठाया भार
हरिद्वार से चंडीगढ़ की ओर पैदल जा रहे इस परिवार ने अपनी कांवड़ का नाम रखा है श्रवण कांवड़
सहारनपुर। देवाधिदेव महादेव का प्रिय श्रावण महिना शुरू होते ही हरिद्वार से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में देवाधिदेव महादेव के भक्तों की आस्था सड़कों पर दिखाई दे रही है।एक ऐसी कांवड़ भी दिखाई दी,जिसने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।यह कांवड़ सिर्फ गंगाजल लेकर जाने की यात्रा नहीं,बल्कि इसमें एक परिवार का अपनी मां के प्रति प्रेम,सेवा,संस्कार और समर्पण भी शामिल था।हरिद्वार से चंडीगढ़ की ओर पैदल जा रहे इस परिवार ने अपनी कांवड़ का नाम श्रवण कांवड़ रखा है,इसमें बेटे और बहुओं ने अपनी बुजुर्ग मां को पालकी में बैठाकर यात्रा पूरी की और देवाधिदेव महादेव का दर्शन कराया।
बता दें कि चंडीगढ़ के राजकुमार की पत्नी पूजा,भाभी केतकी और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ अपनी मां जयदेई को लेकर हरिद्वार पहुंचे थे।एक अगस्त को हरकी पैड़ी पर परिवार ने सबसे पहले मां के पैर धोए,उसके बाद उन्हें गंगा स्नान कराया।परिवार ने मां जयदेई के आशीर्वाद के साथ गंगाजल भरा और फिर यात्रा का अगला पड़ाव शुरू हुआ,इसके बाद बेटा और दोनों बहुएं बारी-बारी से पालकी को अपने कंधों पर उठाकर चंडीगढ़ की ओर पैदल निकल पड़े।चार दिन की लगातार पैदल यात्रा के बाद मंगलवार शाम यह परिवार सहारनपुर पहुंचा।इस अनोखी कांवड़ को देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी।
राजकुमार का कहना है कि उनके परिवार में सभी लोग एक-दूसरे के साथ प्रेम और सम्मान से रहते हैं। राजकुमार ने बताया कि वह पिछले करीब पांच वर्षों से कांवड़ यात्रा कर रहे हैं,लेकिन इस तरह की श्रवण कांवड़ पहली बार लेकर निकले हैं।करीब पांच साल पहले ही उनके मन में यह विचार आया था कि अगली बार जब भी वह कांवड़ यात्रा करेंगे, तो अपनी मां को साथ लेकर जाएंगे।
राजकुमार का कहना है कि माता-पिता अपने बच्चों को पालने में पूरी जिंदगी लगा देते हैं,वे बच्चों को पढ़ाते हैं,उन्हें संस्कार देते हैं और अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए हर संभव त्याग करते हैं,ऐसे में जब माता-पिता बुजुर्ग हो जाते हैं तो उनकी सेवा करना बच्चों का सबसे बड़ा धर्म और दायित्व होना चाहिए।
जयदेई बड़ी बहू केतकी बताती हैं कि उनके माता-पिता ने उन्हें जो संस्कार दिए हैं,वह उन्हीं का पालन कर रही हैं।केतकी का कहना है कि जयदेई ने उन्हें कभी बहू होने का एहसास नहीं होने दिया,हमेशा बेटियों की तरह प्यार दिया और परिवार में सम्मान दिया,यही वजह है कि आज सास की पूरे मन से उनकी सेवा कर रही हैं।
जयदेई की छोटी बहू पूजा अपनी सास के प्रति भावुक नजर आईं। पूजा कहती हैं कि जयदेई ने कभी भी उनके साथ सास जैसा व्यवहार नहीं किया,हमेशा दोनों बहुओं को अपनी बेटियों की तरह माना।परिवार के सभी सदस्य एक साथ रहते हैं,घर में एक ही चूल्हे पर खाना बनता है और सभी लोग मिल-बांटकर खाते हैं।
जयदेई का कहना है कि भगवान उनके बच्चों को हमेशा खुश रखें,उन्हें सुख,समृद्धि और लंबी उम्र दें,वह चाहती हैं कि उनका परिवार हमेशा इसी तरह प्रेम से एकजुट रहे और सभी बच्चे जीवनभर एक-दूसरे का साथ निभाते रहें।
इस कांवड़ को देखकर किसी ने उन्हें कलियुग का श्रवण कुमार कहा तो किसी ने बहुओं के संस्कारों को सलाम किया, लेकिन इस परिवार के लिए यह कोई असाधारण काम नहीं है. राजकुमार ने वही किया है,जो हर संतान को अपने माता-पिता के लिए करना चाहिए।