जीडीपी की बहस छोड़िए,एथनॉल मिश्रित पेट्रोल पर भाजपा समर्थकों की नाराजगी बढ़ रही है

जीडीपी की बहस छोड़िए,एथनॉल मिश्रित पेट्रोल पर भाजपा समर्थकों की नाराजगी बढ़ रही है

07 Sep 2026 |  9

 



धनंजय सिंह।यह बहस गर्म है कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में देश का सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी 7.8 फीसदी की दर से बढ़ा या 2.6 फीसदी की दर से।टीवी स्टूडियो में बैठे लोग जिस तरह रातोरात अर्थशास्त्री बनकर एक-दूसरे की आलोचना कर रहे थे,उसे देखकर सर्जियो गोर को भी जरूर काफी मजा आया होगा।यह सब मजेदार है,लेकिन सियासत के नजरिये से यह एक गलत बहस है।वैसे भी अब दूसरी तिमाही दो तिहाई से ज्यादा गुजर चुकी है तो यह बहस ज्यादा दिन नहीं चलेगी।



सवाल यह है कि यह बहस गलत क्यों है और सही बहस क्या है,यह केवल इसलिए गलत नहीं है कि यह अस्थायी है।बल्कि इसलिए भी है क्योंकि इस ध्रुवीकृत माहौल में लोग बहुत शिद्दत के साथ अपने सियासी सिद्धांतों में यकीन करते हैं। कोई भी मतदाता जीडीपी के आंकड़ों के आधार पर अपना मन नहीं बदलेगा,जो बहस मायने रखती है वह एकदम अलग है।एथनॉल मिश्रण को लेकर गुस्सा।



वाहन मालिकों का एक बड़ा वर्ग खासकर हिंदू मध्य वर्ग मोदी-शाह की भारतीय जनता पार्टी का समर्पित मतदाता हैं,जो बेहद नाराज हैं।हमने इस पर कोई सर्वे नहीं देखा है,लेकिन बीते कुछ महीनों में मैं ऐसे ढेर सारे लोगों से मिला जिनमें हवाई अड्डों पर मिले अजनबी,शादी समारोह में मिले लोग,होटल की लॉबी में मिले लोग,आगंतुक,उबर चालक, आदि शामिल थे।ये सभी बेहद गुस्से में नजर आए।सबके पास एक ही वजह थी हमें पेट्रोल मिला एथनॉल इस्तेमाल करने के लिए मजबूर कैसे किया जा सकता है।



केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के विकास के आंकड़ों का बचाव करने वाले भी उसी तादाद में मौजूद हैं।दूसरे शब्दों में कहें तो इसका मतलब यह है कि जिस आधार को भाजपा इतनी गंभीरता से लेती है वह सिर्फ इसी एक मुद्दे को लेकर उससे नाराज है।



बेशक सभी लोग मानते हैं कि हमने ऑपरेशन सिंदूर में जीत हासिल की और विश्व में,जिसमें पुतिन और शी भी शामिल हैं, उनके नेता का सम्मान करती है,जैसा कि हमने अभी बिश्केक में देखा तो फिर मुझे यह मिलावटी पेट्रोल देकर सजा क्यों दी जा रही है।मोटे तौर पर उनकी चिंताएं और सवाल ये हैं,मुझे इससे क्या फायदा मिलता है,मैं उतनी ही कीमत चुकाता हूं,लेकिन मुझे कम माइलेज मिलता है जैसा कि सरकार खुद स्वीकार करती है। इसके अलावा मैं अभी भी अपनी गाड़ी की ईएमआई चुका रहा हूं जबकि इससे इंजन को नुकसान भी हो सकता है।मेरे देश को इससे क्या फायदा है।अगर कोई फायदा है तो मुझे उसके बारे में क्यों नहीं बताया जा रहा।



मुझे विकल्प क्यों नहीं दिया गया,पहले तो कोई मुझे यह नहीं बताता कि मुझे ईबीपी (एथनॉल मिश्रित पेट्रोल) का इस्तेमाल क्यों करना चाहिए।फिर कहा जाता है कि इसे इस्तेमाल करो या फिर पैदल चलो। मेरे कष्ट या मेरे त्याग का फायदा किसे मिल रहा है।ये अहम सवाल हैं और संभवतः सरकार के पास इनके जवाब भी हैं।हैरानी की बात है कि उसने अपने मतदाताओं को विश्वास में लेने की कोई कोशिश नहीं की। 



अगर परीक्षा घोटालों की लगातार सामने आती घटनाओं के अलावा कोई एक मुद्दा है,जिस पर भाजपा का आधार वर्ग नाराज है तो वह एथनॉल मिश्रित पेट्रोल ही है। साल 2014 से ही हिंदू बहुल मध्यवर्ग मोदी सरकार का सबसे भरोसेमंद वोट बैंक रहा है,उसकी निष्ठा इतनी मजबूत रही है कि उसने ऊंची ईंधन कीमतों को लेकर चिंता और नाराजगी के बावजूद मोदी को वोट दिया।



वह तब भी सरकार के प्रति उदार रहा,जब कच्चे तेल की कीमतें सबसे निचले स्तर पर थीं और सरकार ने उत्पाद शुल्क बढ़ाकर उस लाभ का बड़ा हिस्सा अपने पास रखना जारी रखा। इस अप्रत्याशित राजस्व को गरीबों तक मुफ्त अनाज और अन्य प्रत्यक्ष लाभों के रूप में प्रभावी ढंग से पहुंचाया गया। इससे भाजपा को लगातार चुनाव जीतने में मदद मिली।



ये रॉबिन हुड का हाइब्रिड संस्करण है।वफादार मध्यवर्ग से लो, गरीबों में बांटो और अमीरों को परेशान मत करो।इसका आशय यह था कि जिस तरह पंथ निरपेक्ष पार्टियां मुस्लिम वोट को अपना मानकर चलती हैं उसी तरह भाजपा भी विशाल हिंदू मध्यवर्ग को अपना वोट बैंक मान सकती है। अब यही मतदाता नाराज हैं।



चाहे नोटबंदी हो या अचानक पूरे देश में लगाया गया कोविड-19 लॉकडाउन।बौद्धिक स्तर पर पार्टी हल्के प्रोत्साहन के जरिये व्यवहार में बदलाव वाली अर्थव्यवस्था के विचार को बढ़ावा देती रही है,लेकिन ईबीएम के मामले में न तो कोई स्पष्ट आह्वान किया गया और न ही कोई हल्का प्रोत्साहन दिया गया।



ऐसा लगता है मानो यह विचार अचानक किसी को पसंद आ गया और हम अपने आप 2013-14 में 1.56 फीसदी एथनॉल मिश्रण से बढ़कर अब लगभग 20 फीसदी तक पहुंच गए। अब 30 फीसदी मिश्रण की भी जोरदार चर्चा हो रही है।



यहां दो समस्याएं हैं।पहली खरीदार नाराज हैं और उनकी संख्या भी बहुत बड़ी है। दूसरी अधिक एथनॉल उपलब्ध ही नहीं है। मौजूदा स्तर के मिश्रण को बनाए रखने के लिए भी पर्याप्त एथनॉल नहीं है जब तक कि आप अनाज (चावल) के भंडार में गहराई तक हाथ डालना शुरू न कर दें। इसके अलावा लोग इससे अधिक मिश्रण स्वीकार नहीं करेंगे।



कागज पर देखें तो आयातित कच्चे तेल की जगह देश में उत्पादित एथनॉल का इस्तेमाल करना अच्छा विचार लगता है। दिक्कत यह है कि आपके पास एथनॉल का कोई ऐसा भंडार नहीं है,जिसे जरूरत पड़ने पर निकालकर इस्तेमाल किया जा सके।हमारे किसानों को एथनॉल के लिए फसल उगानी पड़ती है-गन्ना, मक्का या धान।



यह विचार सालों से चले आ रहे चीनी के अधिशेष की स्थिति से निकला था। चीनी मिलें अपना पैसा वसूल कर सकती थीं और किसानों का बकाया चुका सकती थीं। स्थिति इतनी अनुकूल लग रही थी कि चीनी मिलों को गन्ने के रस को सीधे एथनॉल में बदलने की अनुमति तक दे दी गई। बाजार में पहले ही चीनी की भरमार थी।



यह योजना सुनने में बहुत अच्छी थी,लेकिन इसमें खेती की अनिश्चितताओं का कोई हिसाब नहीं लगाया गया। मसलन जिंस बाजार,बारिश और सबसे बढ़कर कीट। महज एक फसल वर्ष के भीतर गन्ना नाटकीय रूप से अधिशेष से किल्लत की स्थिति में पहुंच गया। खासकर रेड रॉट (फफूंद) और टॉप बोरर (कीट) ने पैदावार को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया।  



इस सीजन की शुरुआत चीनी के शुरुआती भंडार में 50 लाख टन की कमी के साथ हुई और अब यह भंडार घटकर करीब 2.8 करोड़ टन की ओर बढ़ रहा है। नतीजा यह हुआ कि चीनी की कीमतों में करीब 50 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई। त्योहारों का मौसम सामने है, तो क्या हम चीनी की कीमतों को आसमान छूने दे सकते हैं।



जैसे-जैसे एथनॉल की खरीद में बेतहाशा बढ़ोतरी की गई और यह 2013-14 में 38 करोड़ लीटर से बढ़कर इस साल 1,200 करोड़ लीटर तक पहुंच गया। इसके साथ ही रिफाइनर मक्के की ओर मुड़ गए। इसके बाद मक्के की कीमतों में भी करीब 50 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई। इसका मतलब यह है कि दूध, पोल्ट्री और मांस की कीमतें भी बढ़ सकती हैं, क्योंकि मक्का पशु आहार में इस्तेमाल होता है।



अब बारी धान की आई। पहले टुकड़ा चावल का इस्तेमाल किया गया और फिर किसी भी अतिरिक्त चावल का। इस साल ईंधन के लिए 75 लाख टन चावल आवंटित किया गया है और सरकार ब्लेंडिंग जारी रखने के लिए इसे बाजार कीमत की लगभग आधी कीमत पर बेच रही है। 



इनमें से काफी आंकड़े मैंने द इंडियन एक्सप्रेस में हरीश दामोदरन और अशोक गुलाटी के बेहतरीन विश्लेषणों से लिए हैं। इसे आपके लिए संक्षेप में कहूं तो बात यह है कि ईबीपी भले ही एक शानदार विचार हो,लेकिन चूंकि यह कृषि पर निर्भर था इसलिए इसे लागू करने से पहले तीन-चार साल की तैयारी जरूरी थी।



किसान को अपनी फसल का चुनाव बदलने के लिए तैयार करना था,उसके लिए बाजार तैयार करना था,यह सुनिश्चित करना था कि किसी भी जरूरी खाद्य वस्तु की कमी न हो और हम खाद्य बनाम ईंधन के जाल में न फंस जाएं।अंत में उपभोक्ता को मिश्रित पेट्रोल के लिए तैयार करना था।



आदर्श स्थिति यह होती कि उन्हें विकल्प दिया जाता और मिश्रित पेट्रोल की कीमत सामान्य पेट्रोल से काफी कम रखी जाती। यह काम उत्पाद शुल्क में बदलाव करके आसानी से किया जा सकता था।



परिणामस्वरूप चीनी की किल्लत है। विदेशी मुद्रा का भंडार तेजी से खर्च हो रहा है,त्योहारों के मौसम में कीमतें बढ़ गई हैं और ईबीपी के लिए चावल के बफर स्टॉक को लगभग आधी कीमत पर खपाया जा रहा है।  कई मायनों में यह कई अहम मुद्दों पर मोदी सरकार के काम करने के तरीके को रेखांकित करता है।



अतीत में खासकर नोटबंदी और कृषि कानूनों के बाद,जिनका मैंने संपादकीय रूप से समर्थन किया था। हमने मोदी सरकार के इस तरह के फैसले लेने के तरीके की तुलना ऐसे पैराट्रूपर से की है,जो पैराशूट की जांच किए बिना ही छलांग लगा देता है।



ईबीपी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। हमारे पास चीनी की कमी है,एथनॉल की कमी है और जिन चीजों का इसमें इस्तेमाल हो रहा है, उन सभी की कीमतें बढ़ रही हैं। यहां तक कि कच्चे तेल की कीमत भी। ऐसे में एक और नीतिगत वापसी पर विचार होना चाहिए भले ही आंशिक रूप से।



या तो मिश्रण को घटाकर 10 फीसदी किया जाए या उपभोक्ताओं को विकल्प दिया जाए। ध्यान रहे यह नाराजगी भाजपा के प्रतिबद्ध मतदाताओं की ओर से आ रही है।


ट्रेंडिंग