धनंजय सिंह।आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के प्रयोग में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है,लेकिन इसके साथ एक बड़ी परेशानी भी खड़ी हो रही है।एआई को चलाने के लिए बहुत ज्यादा कंप्यूटिंग क्षमता चाहिए और इसके लिए बड़े-बड़े डेटा सेंटर बनाए जा रहे हैं।इन डेटा सेंटर को चलाने के लिए भारी मात्रा में बिजली की जरूरत पड़ती है।कई जगह बिजली मिलने में देरी हो रही है और बिजली नेटवर्क से जुड़ने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।
ऐसे में एक ऐसा विकल्प सामने आ रहा है,जो अभी सुनने में किसी साइंस फिक्शन फिल्म जैसा लग सकता है।सवाल यह है कि क्या भविष्य में एआई के डेटा सेंटर धरती के बजाय अंतरिक्ष में बनाए जा सकते हैं।
गोल्डमैन सैक्स ग्लोबल इंस्टीट्यूट की बीते माह अगस्त की रिपोर्ट में अंतरिक्ष में बड़े स्तर पर कंप्यूटिंग क्षमता तैयार करने को तेजी से उभरता हुआ क्षेत्र बताया गया है।अंतरिक्ष में अभी भी कंप्यूटिंग होती है,लेकिन इसका इस्तेमाल सीमित स्तर पर किया जाता है।अब कंपनियां यह समझने की कोशिश कर रही हैं कि क्या इसे बड़े पैमाने पर ले जाया जा सकता है। इसकी एक बड़ी वजह एआई के कारण कंप्यूटिंग की तेजी से बढ़ती मांग और धरती पर नए डेटा सेंटर बनाने में आने वाली परेशानियां हैं।
अभी विश्व के अधिकतर डेटा सेंटर धरती पर हैं।यहां सर्वर और बेहद ताकतवर चिप लगातार काम करते हैं।इनके लिए सिर्फ बड़ी मात्रा में बिजली ही नहीं चाहिए,बल्कि मजबूत बिजली नेटवर्क और दूसरी सुविधाओं की भी जरूरत होती है।
धरती पर डेटा सेंटर के विस्तार में तीन बड़ी दिक्कतें सामने आ रही हैं।पहला पर्याप्त बिजली की उपलब्धता,दूसरा बिजली का नया कनेक्शन मिलने में लंबा इंतजार और तीसरा नए प्रोजेक्ट के लिए मंजूरी मिलने में होने वाली देरी।एआई की मांग जितनी तेजी से बढ़ रही है,इन परेशानियों की अहमियत भी उतनी ही बढ़ सकती है।
इसका जवाब सूरज है।धरती पर सोलर पैनल की सबसे बड़ी सीमा यह है कि रात में सूरज नहीं होता।बादल और मौसम भी बिजली उत्पादन को प्रभावित करते हैं।अंतरिक्ष में तस्वीर अलग हो सकती है।खास तरह की कक्षा में सोलर पैनल लगाकर लगभग लगातार सौर ऊर्जा हासिल करने की संभावना है।इससे अंतरिक्ष में बहुत बड़े स्तर पर बिजली उपलब्ध कराने का रास्ता खुल सकता है।इसके अलावा वहां धरती की तुलना में मंजूरी और जमीन जैसी कुछ अड़चनें भी कम हो सकती हैं।यानी जिस एआई को चलाने के लिए धरती पर बिजली की कमी चिंता बढ़ा रही है,उसके लिए भविष्य में अंतरिक्ष की सौर ऊर्जा एक विकल्प बन सकती है।
फिलहाल इसके सामने कई बड़ी तकनीकी चुनौतियां हैं।सबसे पहली समस्या गर्मी है।आम तौर पर हमें लगता है कि अंतरिक्ष बहुत ठंडा है,इसलिए वहां कंप्यूटर और चिप को ठंडा रखना आसान होगा,लेकिन मामला उल्टा भी पड़ सकता है।अंतरिक्ष लगभग निर्वात है।इसलिए शक्तिशाली चिप से निकलने वाली गर्मी को बाहर निकालना इंजीनियरों के लिए बड़ी चुनौती है। चिप को ठंडा रखने वाले रेडिएटर तैयार करना आसान नहीं होगा।दूसरी समस्या डेटा भेजने और वापस लाने की है। अगर अंतरिक्ष में बैठे कंप्यूटर को धरती से बहुत बड़ी मात्रा में डेटा लेना और भेजना है, तो उसके लिए बेहद मजबूत संचार व्यवस्था चाहिए। अभी अंतरिक्ष से धरती तक ज्यादा डेटा तेजी से भेजना आसान नहीं है।
धरती पर किसी डेटा सेंटर में सर्वर या चिप खराब हो जाए तो इंजीनियर उसे बदल सकते हैं।अंतरिक्ष में ऐसा करना बेहद मुश्किल और महंगा होगा।अंतरिक्ष में कोई चिप या पुर्जा खराब हो जाए, तो उसे ठीक करना अभी आसान नहीं है। इसके अलावा वहां मौजूद रेडिएशन से बचाने के लिए ताकतवर कंप्यूटिंग चिप में बदलाव करने पड़ सकते हैं।यानी केवल डेटा सेंटर को रॉकेट में रखकर अंतरिक्ष में भेज देना इसका समाधान नहीं है। पूरी तकनीक को अंतरिक्ष के माहौल के हिसाब से तैयार करना होगा।
अगर भविष्य में अंतरिक्ष में बड़े पैमाने पर कंप्यूटिंग शुरू होती है तो इससे कई तरह की कंपनियों के लिए कारोबार के नए मौके खुल सकते हैं।इसके लिए रॉकेट लॉन्च करने वाली कंपनियां चाहिए होंगी,सोलर पैनल और बिजली व्यवस्था तैयार करनी होगी,सैटेलाइट और दूसरे उपकरण बनाने होंगे, धरती और अंतरिक्ष के बीच तेज संचार नेटवर्क चाहिए होगा। खराब उपकरणों की मरम्मत और उन्हें बदलने की तकनीक भी चाहिए होगी।
यानी अंतरिक्ष में अब सिर्फ रॉकेट और सैटेलाइट का ही कारोबार नहीं रहेगा,बल्कि कई नए तरह के कारोबार भी शुरू हो सकते हैं।सस्ता होता रॉकेट लॉन्च,छोटे सैटेलाइट और नई तकनीक ऐसे कारोबारी मॉडल के लिए रास्ता खोल रहे हैं, जो पहले संभव नहीं थे।दुनिया की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था 2035 तक बढ़कर 1.8 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच सकती है।