लखनऊ।तमाम तानाशाहों में कभी न कभी सनक और आशंका नजर आने लगती है।तानाशाह इसलिए जीते हैं,क्योंकि उनके पास रिटायरमेंट को कोई योजना कभी नहीं हो सकती।आज भले ही वे सबकी तकदीर तय कर रहे हों, लेकिन सत्ता चली गई तो वे अपनी ही तकदीर तय नहीं कर सकते।यही कारण है कि पाकिस्तानी तानाशाहों में कभी न कभी इस तरह के लक्षण दिखाई देने लगते हैं।
1950 के दशक के उत्तरार्ध में जब अयूब खान ने सत्ता हासिल की और फील्ड मार्शल बने।उसके बाद से भारत के लिए सबसे अहम रणनीतिक यथार्थ यही रहा है।आम तौर पर इस तरह के डर खुलकर सामने आने में पांच से सात साल लगते हैं,लेकिन आसिम मुनीर के मामले में यह बहुत तेजी से सामने आ रहा है।ऑपरेशन सिंदूर के बाद से कम-से-कम चार ऐसे चरण रहे हैं,जब मुनीर ने खुद को अतिरिक्त शक्तियां या नई-नई उपाधियां प्रदान की हैं।
पिछले गुरुवार को एकाएक सेना से जुड़े दो अत्यंत महत्वपूर्ण कानून पाकिस्तान की नैशनल असेंबली में,जिस नाटकीय ढंग से पारित हुए,उसने पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान पर करीबी नजर रखने वालों को भी हैरान कर दिया होगा।इन कानूनों ने आसिम मुनीर के हाथों में और भी शक्तियां दे दी हैं।
पाकिस्तान की कैबिनेट ने गुरुवार सुबह बैठक की और डिफेंस फोर्सेज एक्ट 2026 और नैशनल कमांड अथॉरिटी एक्ट, 2010 में संशोधन को मंजूरी दी गई।दोनों विधेयक सीधे नैशनल असेंबली के पास भेज दिए गए,जिसने 30 मिनट के भीतर उन्हें मंजूरी दे दी और सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी गई।विपक्ष ने सदन का बहिष्कार किया,सत्तारूढ़ गठबंधन की दूसरी सबसे बड़ी सहयोगी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) ने विरोध जताया,लेकिन कानूनों के पक्ष में मतदान भी कर दिया।पीपीपी से आने वाले राष्ट्रपति ने भी बिजली की तेजी से इन पर हस्ताक्षर कर दिए। आसिम मुनीर को इंतजार करवाने की हिम्मत किसी की नहीं है।
ये कानून 27वें संविधान संशोधन के परिणामस्वरूप बनी व्यवस्थाओं को 27 नवंबर 2025 यानी पिछली तारीख से औपचारिक जामा पहनाते हैं।इस संशोधन ने संविधान को बुरी तरह क्षत-विक्षत कर दिया,चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (सीडीएफ) का नया पद बनाया और तय कर दिया कि सेना प्रमुख ही इस पद पर रह सकता है।इससे मुनीर को पांच साल का नया कार्यकाल मिल गया,जो 30 नवंबर 2030 तक चलेगा। मुनीर आजीवन फील्ड मार्शल बने रहेंगे और उस रैंक के सभी लाभ भी उन्हें मिलते रहेंगे।
इस संशोधन के साथ आसिम मुनीर को अभियोजन से हमेशा के लिए अभयदान भी मिल गया। इन प्रावधानों को बारीकी से पढ़ें तो मुनीर ने जो अतिरिक्त शक्तियां अपने हाथ में ली हैं वे बहुत ज्यादा और प्रभावशाली हैं।इन शक्तियों का कारण या तो गहरा असुरक्षा-बोध हो सकता है या सनक और डर।हर तानाशाह कभी न कभी अपनी ही परछाई से डरने लगता है। मुनीर के लिए वह समय जल्दी आ गया है।
नए कानूनों के तहत आसिम मुनीर सशस्त्र बलों के कर्मियों को नियुक्त,बर्खास्त और रिटायर कर सकते हैं। या अपनी मर्जी से उनका कार्यकाल बढ़ा सकते हैं।यह किसी वफादार सूबेदार-मेजर या कर्नल पर ही लागू नहीं होगा बल्कि मुनीर के बराबर के वरिष्ठ अधिकारियों पर भी लागू होगा। इसका मतलब है कि मुनीर अपने किसी भी जनरल खासकर कोर कमांडरों को समय से पहले रिटायर कर सकते हैं या उनका कार्यकाल बढ़ा सकते हैं।पहली बात उन्हें मुनीर से डरने पर मजबूर करेगी और दूसरी लालची बनाएगी। कोर कमांडरों के बीच बेचैनी की खबरें और फुसफुसाहटें पहले से सुनाई दे रही हैं।वरिष्ठ सैन्य अधिकारी इस बात से खीझ रहे हैं कि मुनीर शीर्ष पर बैठ गए हैं और उत्तराधिकारियों की पूरी कतार उन्होंने रोक दी है।
नया कानून कुछ को डराएगा और कुछ के लिए उम्मीद लाएगा।इस कानून का इससे बेहतर नाम शायद पाकिस्तान डिफेंस (चाटुकारिता पसंदगी) एक्ट हो सकता है।आसिम मुनीर ने अपने वफादार सैयद आमिर रजा को हाल ही में पदोन्नत कर फोर-स्टार जनरल और नवगठित नैशनल स्ट्रैटजिक कमांड का कमांडर बनाया है। नए कानून से रजा तब तक पद पर बने रहेंगे, जब तक मुनीर चाहेंगे।
सबसे पुराना सच यही है कि सभी तानाशाह अकेले और डरे हुए होते हैं।आसिम मुनीर के डर को परिभाषित करने के लिए बेहतर शब्द एक्रोफोबिया (ऊंचाई से डर) होगा। मुनीर बहुत जल्दी बहुत ऊंचाई तक पहुंच गए हैं। मुनीर को पता ही नहीं है कि आगे कहां जाना है और इस बीच जो दुश्मन बनाए हैं, उनका खटका उन्हें लगा रहता है।
आसिम मुनीर के रुतबे की बात करें तो पाकिस्तान की राष्ट्रीय शक्ति उसकी सेना पर आधारित है।अर्थव्यवस्था मृतप्राय है और उसे उबारने की कोई कोशिश भी नहीं दिखती। अब सऊदी अरब से ही किसी बड़ी आर्थिक मदद की उम्मीद है,लेकिन खुद कर्ज में दबा सऊदी अरब पाकिस्तानी सेना की सेवाओं के बदले दो अरब डॉलर से ज्यादा शायद ही दे सके।
पाकिस्तान की सेना की भी सीमाएं हैं।वह अपनी पश्चिमी सीमाओं पर चल रहे विभिन्न विद्रोहों को निर्णायक रूप से खत्म नहीं कर पा रही है और न ही भारत के खिलाफ कोई सैन्य बढ़त हासिल कर सकती है। ऐसे में आसिम मुनीर के पास क्या है।मुनीर की प्रतिभा सैन्य कौशल में नहीं बल्कि अपनी सेना के नियंत्रण वाली राज्य-व्यवस्था की क्रूर राजनीति को समझने में है।मुनीर इसके जोखिम समझते हैं। यह सामान्य राजनीति नहीं है।
इसे परिभाषित करने के लिए तीन विकल्प हैं।निर्दयी प्रतिस्पर्धा,पीठ में छुरा घोंपने वाली राजनीति या किसी को भी नहीं बख्शने वाली राजनीति।आसिम मुनीर अपना भविष्य सुरक्षित नहीं कर सकते।ऐसे में वर्तमान को बचाए रखने का जुनून स्वाभाविक है। इसलिए ये नए कानून मुनीर के लिए अतिरिक्त कवच की परत हैं।
आसिम मुनीर का जन्म 1968 में हुआ था। 58 वर्ष की उम्र में अभी मुनीर अपेक्षाकृत युवा हैं और सेना प्रमुख के रूप में अपने पांचवें वर्ष के करीब हैं।अब मुनीर को चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (सीडीएफ) के पद से भी नवाजा गया है। 30 नवंबर 2030 को जब पांच साल का मुनीर का नया कार्यकाल समाप्त होगा तब उनकी उम्र केवल 62 वर्ष होगी। इसी उम्र में भारतीय सेना प्रमुख रिटायर होते हैं।जनरल धीरज सेठ मुनीर के कार्यकाल के दौरान भारत के तीसरे सेनाध्यक्ष हैं और नवंबर 2030 तक मुनीर के सामने पांचवें भारतीय सेना प्रमुख आ चुके होंगे। 2030 के बाद मुनीर कहां जाएंगे यही उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
कई पाकिस्तानी मानते हैं कि उससे बहुत पहले ही वह खुद को राष्ट्रपति घोषित कर देंगे और उस पद का कोई कार्यकाल तय नहीं होगा।संभवतः वे सही सोच रहे हैं,लेकिन उनसे पहले राष्ट्रपति बने जनरलों का इतिहास बताता है कि समय कभी ठहरता नहीं।
अयूब ने 1965 और याह्या खान ने 1971 के राजनीतिक सैन्य दुस्साहसों के जरिये अपने ही हाथों से अपने पतन और अपमान की पटकथा लिखी थी।जिया अपनी सत्ता के चरम पर दुर्भाग्य की भेंट चढ़ गए।परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान के अतातुर्क बनने की कोशिश में थे,लेकिन न तो उनमें जरूरी बौद्धिक क्षमता थी और न ही सेना का पर्याप्त समर्थन।अंततः वे देशद्रोह के मामले में दोषी ठहराए गए और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई।
पाकिस्तानी तानाशाह के लिए तीन ही रास्ते हैं,जेल,निर्वासन या हत्या।अगर आसिम मुनीर के भविष्य की थोड़ी कल्पना की जाए तो उनके सामने तीन विकल्प दिखाई देते हैं और इनमें रिटायर होकर घर बैठना और गॉल्फ खेलना तो नहीं है।पहला विकल्प है,मुनीर अपना कार्यकाल पूरा करके चुपचाप अमेरिका चले जाएं।वहां मुनीर के पास जमा की हुई दौलत और जायदादा होगी।कृतज्ञ अमेरिकी मुनीर प्रत्यर्पित नहीं करेंगे भले ही उनका उत्तराधिकारी उन्हें मिला अभयदान खत्म कर दे।दूसरा रॉबर्ट मुगाबे की तरह मुनीर भी खुद को आजीवन राष्ट्रपति घोषित कर दें।तीसरा मुनीर वास्तव में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को पटरी पर ले आएं, समाज में शांति लाएं, आपसी संघर्षों को खत्म करें और नए गणराज्य का निर्माण करें।ये तभी होगा,जब मुनीर भारत के साथ शांति स्थापित करें,कश्मीर के लिए जुनून खत्म कर दें और अपने राष्ट्रवाद को इस्लामीकरण से मुक्त करें।यह सबसे सुरक्षित रास्ता होगा। मगर यह असंभव न सही, सबसे मुश्किल जरूर होगा।