ज्ञानवापी परिसर में मां श्रृंगार गौरी की पूजा,9 दिन तक बाबा विश्वनाथ को सुनाई जाती है राम कथा,औरंगजेब के काल से जुड़ा है इतिहास

ज्ञानवापी परिसर में मां श्रृंगार गौरी की पूजा,9 दिन तक बाबा विश्वनाथ को सुनाई जाती है राम कथा,औरंगजेब के काल से जुड़ा है इतिहास

24 Jan 2026 |  42

 



वाराणसी।आध्यात्मिक नगरी काशी में शनिवार को उस परंपरा का निर्वहन किया गया,जो 17वीं शताब्दी के संघर्षों से जुड़ी हैं।औरंगजेब काल से चली आ रही प्राचीन परंपरा के तहत ज्ञानवापी की पश्चिमी दीवार पर संतों ने मां श्रृंगार गौरी के विग्रह का दर्शन-पूजन किया।इस पूजन के साथ ही नौ दिवसीय विशेष राम कथा की शुरुआत हुई,जिसे परंपरा के अनुसार बाबा विश्वनाथ को सुनाया जाता है।



काशी के विद्वानों और इतिहासकारों के मुताबिक...



काशी के विद्वानों और इतिहासकारों के मुताबिक ये परंपरा साल 1669 के बाद शुरू हुई थी।मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश पर आदि विश्वेश्वर मंदिर को क्षति पहुंचाई गई थी,तब मां श्रृंगार गौरी के मंदिर और विग्रह को भी तोड़ा गया था।उस कठिन काल में काशी के ब्राह्मणों ने मां श्रृंगार गौरी के विग्रह के अवशेषों को ज्ञानवापी की पश्चिमी दीवार के पास रखकर पूजन जारी रखा।तभी से यह संकल्प लिया गया कि प्रतिवर्ष यहां पूजन होगा और बाबा विश्वनाथ को राम कथा सुनाई जाएगी।



मुलायम सरकार में लगी थी रोक,योगी सरकार में हुई बहाली



ये परंपरा सदियों तक चलती रही।साल 1991 में तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार के दौरान सुरक्षा और अन्य कारणों का हवाला देकर इस पूजन पर रोक लग गई थी। करीब तीन दशकों तक ये परंपरा प्रतीकात्मक रही,लेकिन पिछले तीन सालों से इसे फिर से पूर्ण विधि-विधान के साथ शुरू किया गया है।संतों का मानना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में इस प्राचीन परंपरा को पुनर्जीवित करने में अहम भूमिका निभाई गई है,जिससे काशी के भक्तों में बेहद खुशी है।



पश्चिमी दीवार की गैलरी में गूंजती है राम कथा



अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने बताया कि यह राम कथा काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर के ज्ञानवापी के पश्चिमी दीवार के पास स्थित गैलरी में आयोजित की जाती है।यह एक अद्भुत दृश्य होता है,जहां एक ओर शक्ति स्वरूपा मां श्रृंगार गौरी का पूजन होता है, तो दूसरी ओर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की कथा बाबा विश्वनाथ के चरणों में अर्पित की जाती है।



बता दें कि यह आयोजन न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि आध्यात्मिक नगरी काशी की उस अटूट श्रद्धा का प्रतीक भी है,जिसने तमाम संघर्षों के बाद भी अपनी संस्कृति को जीवित रखा है।


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