न्याय के दो स्तंभ और नैतिक मूल्यों की विरासत,राज्य के मुख्य न्यायाधीश ने कानूनविदों को दिखाई नयी राह

न्याय के दो स्तंभ और नैतिक मूल्यों की विरासत,राज्य के मुख्य न्यायाधीश ने कानूनविदों को दिखाई नयी राह

06 Apr 2026 |  7

 



जीतेन्द्र ज्योतिषी 



चाईबासा। झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश महेश शरद चंद्र सोनक ने बार एसोसिएशन के साथ बैठक में अपने चाईबासा दौरे के दौरान एक मार्मिक बात कही।उन्होंने रेखांकित किया कि न्यायाधीश और अधिवक्ता न्याय व्यवस्था के दो ऐसे मजबूत स्तंभ हैं,जिनके बीच का समन्वय ही लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की गरिमा को सुरक्षित रखता है। विशेषकर नई पीढ़ी के कानूनविदों के लिए उनके द्वारा दिया गया यह संदेश।



वरिष्ठों का सम्मान और कनिष्ठों का मार्गदर्शन पेशेवर नैतिकता का एक अनिवार्य अध्याय है।न्याय के इस क्षेत्र में कदम रखने वाले युवाओं के लिए यह एक विमर्श प्रस्तुत करता है।



 न्याय के दो पहियों का संतुलन



अदालत केवल एक इमारत नहीं,बल्कि एक जीवंत तंत्र है,जहां न्यायाधीश और वकील एक-दूसरे के पूरक हैं।मुख्य न्यायाधीश का यह कहना कि दोनों मजबूत स्तंभ हैं,इस ओर संकेत करता है कि न्याय केवल निर्णय सुनाने से नहीं, बल्कि सही दलील और निष्पक्ष विवेचना के संगम से मिलता है। नई पीढ़ी के वकीलों को यह समझना होगा कि उनकी भूमिका केवल मुवक्किल का पक्ष रखना नहीं, बल्कि सत्य तक पहुंचने में न्यायालय की सहायता करना भी है।



वरिष्ठता का सम्मान,एक जीवंत परंपरा



विधि का क्षेत्र केवल किताबों से नहीं,बल्कि अनुभवों से सीखा जाता है।वरिष्ठ अधिवक्ताओं का सम्मान केवल औपचारिकता नहीं,बल्कि उस अनुभव की लाइब्रेरी के प्रति कृतज्ञता है, जिसने दशकों तक कानून की पेचीदगियों को सुलझाया है। नई पीढ़ी के लिए वरिष्ठों के आचरण,तर्क करने की शैली और धैर्य को आत्मसात करना ही उनकी सफलता की पहली सीढ़ी है।



कनिष्ठों का मार्गदर्शन,भविष्य की तैयारी



अनुभवी वकीलों और जजों की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वे नए आए युवाओं का हाथ थामें।एक स्वस्थ विधिक वातावरण वही है,जहां कनिष्ठों को सवाल पूछने की आजादी हो और वरिष्ठों में उन्हें सिखाने का धैर्य। मुख्य न्यायाधीश का मार्गदर्शन इस बात पर जोर देता है कि अगर आज की पौध को सही दिशा दी जाएगी, तभी कल का न्याय वृक्ष वटवृक्ष की तरह अडिग रहेगा।



पेशेवर मर्यादा और अनुशासन



मुख्य न्यायाधीश का निरीक्षण और उसके बाद का यह संवाद यह भी दर्शाता है कि न्याय प्रक्रिया में अनुशासन सर्वोपरि है। नए वकीलों को अपनी तकनीकी दक्षता के साथ-साथ कोर्ट रूम के शिष्टाचार को भी उतनी ही प्राथमिकता देनी चाहिए। 



मुख्य न्यायाधीश महेश शरद चंद्र सोनक के विचार झारखंड की न्यायपालिका के लिए एक रोडमैप की तरह हैं। न्याय के इन दो स्तंभों के बीच जितना अधिक वैचारिक तालमेल और सम्मान का भाव होगा, आम जनता का न्याय प्रणाली पर विश्वास उतना ही प्रगाढ़ होगा। नई पीढ़ी के अधिवक्ताओं को इन शब्दों को केवल एक भाषण नहीं, बल्कि अपने करियर का मूल मंत्र मानना चाहिए।


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